तेल का सियासी मोल - Oil prices going up and host of geopolitical and geoeconomic factors are responsible for this.

तेल का सियासी मोल

Oil prices going up and host of geopolitical and geo-economic factors are responsible for this.

Oil Prices around world

इस हफ्ते की शुरुआत में कच्चे तेल का प्रति बैरल मूल्य पिछले दो वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। ब्रेंट क्रूड 64.65 डॉलर प्रति बैरल के भाव पर दर्ज किया गया। न से आए आंकड़े बताते हैं कि तेल आयात में सुस्ती आने से कच्चे तेल के दाम इतना ऊपर चढ़े हैं। बहरहाल इतना तो साफ है कि कच्चे तेल के बाजार में बढ़त का रुख बना हुआ है।
Causes?
 पिछले साल प्रमुख तेल उत्पादक देशों के बीच हुए समझौते ने भी कच्चे तेल का भाव चढ़ाने में अपनी भूमिका निभाई है।
 पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) के गैर-सदस्य देशों ने भी कच्चे तेल के उत्पादन को दोबारा ऊपर ले जाने पर सहमति जताई थी।
 अब काफी कुछ अमेरिका में शेल ऑयल बाजार की गतिशीलता पर निर्भर करता है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि तकनीकी सुधारों और संवद्र्धित क्षमता का तेल की भावी कीमतों पर क्या असर होगा?
 जहां कच्चे तेल की प्रति बैरल कीमत का निर्धारण अमेरिकी शेल ऑयल की लागत के आधार पर होता रहेगा वहीं कई लोगों का मानना है कि तेल उत्पादन के प्रमुख केंद्र सऊदी अरब में राजनीतिक अनिश्चितता होने और अन्य पश्चिम एशियाई देशों में भी संघर्ष के हालात बने रहने से कच्चे तेल के भाव 70 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर जा सकते हैं।
 बैंक ऑफ अमेरिका मेरिल लिंच ने यहां तक कहा है कि तेल 75 डॉलर प्रति बैरल का स्तर भी छू सकता है। ऐसे में अचरज नहीं है कि भारतीय इक्विटी बाजार ने तेल मूल्य के प्रति अपनी प्रतिक्रिया चिंता के तौर पर जताई है। सेंसेक्स पिछले दो कारोबारी दिवसों में 500 से भी अधिक गिर चुका है। विमानन, प्लास्टिक, रसायन एवं परिवहन जैसे क्षेत्रों पर तेल के बढ़े हुए मूल्य का तगड़ा असर होने का अनुमान है।

How it could negatively affect Indian economy


तेल कीमत में बढ़ोतरी भारत सरकार के लिए एक मुश्किल समय पर हुई है। सरकार आर्थिक विकास की धीमी पड़ती रफ्तार को देखते हुए अपनी आर्थिक नीतियों के बचाव में लगी हुई है। विपक्ष लगातार यह सवाल उठाता रहा है कि ईंधन खासकर पेट्रोल पर कर अधिक क्यों रखा गया है? आने वाले समय में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव भी होने वाले हैं। इसी तरह अगले साल इस समय तक लोकसभा चुनाव अभियान भी आकार लेने लगेगा। ऐसी स्थिति में सरकार के सामने पेट्रोलियम उत्पादों पर लगे करों को बनाए रख पाने की सियासी गुंजाइश काफी कम रह जाएगी। इसके अलावा सरकार के लिए अपने उस मंत्र पर भी टिके रहना मुश्किल होगा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार की ताकतें घरेलू स्तर पर पेट्रोलियम कीमतों को निर्धारित करती हैं। अगर सरकार खुद को चारों तरफ से घिरा हुआ पाती है या तेल के भाव अचानक बढ़ जाते हैं तो फिर यह भी हो सकता है कि सरकार ‘अंशकालिक’ सब्सिडी का ऐलान कर दे। फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं है कि घरेलू स्तर पर तेल कीमतों के निर्धारण और करारोपण में बड़ी मुश्किल से हासिल स्थिरता को तिलांजलि देने से सार्वजनिक वित्त पर गहरी चोट लगेगी।

एक आरटीआई आवेदन में मिली जानकारी के मुताबिक सरकार को वित्त वर्ष 20160-17 में पेट्रोलियम उत्पादों पर कर लगाने से 2.67 लाख करोड़ रुपये का राजस्व मिला। पांच साल पहले कच्चे तेल के भावों के आसमान पर होने के दौरान सरकार को हासिल राजस्व से यह राशि तिगुनी है। सरकार राजकोषीय सुदृढ़ीकरण की अपनी राह पर डटे रहने में परेशानी महसूस कर रही है। दरअसल लोकलुभावन कदमों के चलते सार्वजनिक व्यय बढ़ रहा है और निजी क्षेत्र के निवेश में गिरावट आने से सरकार अपना पूंजीगत व्यय बढ़ाकर उसकी भरपाई करना चाहती है। प्रधानमंत्री कार्यालय और वित्त मंत्रालय के सामने एक अरुचिकर सवाल खड़ा होने वाला है। सरकार तेल कीमतों को ऊंचे स्तर पर बना रहने से पैदा होने वाले राजनीतिक जोखिम का सामना करे या फिर राजकोषीय बुद्धिमत्ता को तिलांजलि दे दे? इस पर फैसला तो समझदारी से करना होगा।
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